इस्लाम मज़हब महाफ़िज़-ए-इन्सानियत!

इस्लाम मज़हब महाफ़िज़-ए-इन्सानियत!

आज दुिनया में जितने भी धर्म हैं उनमें इस्लाम सब से नया और आखरी मज़हब है। इस मज़हब का बुनियादी उसूल इन्सानियत की हिफाज़त और मसावात के पैग़ाम को पूरी दुनिया में फैलाना है। हमारे पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद स0 की पूरी अमली ज़िन्दगी इस बात का सबूत है कि उन्होंने अपने कर्मों के जरिये यह साबित किया कि इस्लाम धर्म अमन और शान्ति का मज़हब है। उॅच – नीच को मिटाने का मज़हब है। जात-पात और नस्ल की बुनियाद पर खुद को बरतर कहलाने वालों को उन्होंने यह सबक़ दिया कि दुनिया में सब इन्सान बराबर है और इन्सान सिर्फ और सिर्फ अपने अमलों (कर्तव्यों) की बुनियाद पर ही छोटा या बड़ा समझा जाएगा। इस्लाम मज़हब जो कु़रान और हदीस की रौषनी में ही जिन्दगी गुज़ारने का सबक़ देता है उसमें इस बात की पूरी वज़ाहत कर दी गई है कि मानव सेवा से बढ़ कर कोई पुन्य कार्य नहीं हो सकता। ज्ञातव्य हो कि इस्लाम धर्म में इस बात की सख्त मनाही है कि इस्लाम का मानने वाला किसी भी दूसरे मज़हब के मानने वालों को बुरा न कहे। इस्लाम सिर्फ यह सबक देता है कि मुसलमान अपने कर्तव्यों से यह साबित करे कि इस्लाम एक अच्छा मज़हब है।

एक वाकेया है कि हमारे पैगम्बर हज़रत मोहम्मद स0 ने जब मक्का छोड़ कर मदीना हिजरत की तो वहाँ हुजूर स0 ने अपने अनुयायों से साफ तौर पर कहा कि वह दूसरे मज़हब के मानने वालों को जोर – जबरदस्ती के साथ इस्लाम मज़हब कबूल करने पर मजबूर न करें बल्कि उन लोगों को अपने – अपने मज़हब पर रहने दें। यह सबक़ साबित करता है कि इस्लाम कभी भी ताकत के बल पर नहीं फैलाया गया। एक दूसरा वाकेया है कि जब मक्का फतह हो गया और उन लोगों को पकड़ कर लाया गया जो जंग में हार चुके थे और कैदी थे उस मौका पर हज़रत पैगम्बर स0 ने तमाम कैदियों को माफी देने का एलान कर दिया और कहा कि जो लोग खुद इस्लाम मज़हब कुबूल करना चाहते हैं उन्हें ही इस्लाम मज़हब में शामिल किया जाये। एक मौके पर हज़रत स0 ने कहा कि जंग के दौरान औरतों, बूढ़ों और बच्चों को किसी तरह की तकलीफ न पहूंचाई जाय। साथ ही साथ उन्हों ने यह भी फ़रमाया कि हरे भरे खेतों में लहलहाती फसलों को नुकसान न पहूंचाया जाय। इस्लाम के यह उसूल इस बात की गवाही देते हैं कि इस्लाम न सिर्फ़ मानवता का रक्षक है बल्कि वह पर्यावरण की हिफाज़त का भी सबक देता है। हज़रत मोहम्मद स0 का कौल है कि यदि तुम्हारा पड़ोसी भूका है तो तुम पर खाना हराम है।

यह उपदेष समाज में समानता कायम करने का पैगाम देता है। सनद रहे कि यहाँ सिर्फ पड़ोसी कहा गया है, पड़ोसी किसी भी मजहब का हो सकता है उसके साथ अच्छा सुलूक करना इस्लाम के उसूलों में शामिल है। आज के वैज्ञानिक युग में भ्रुण हत्या पर हाय तौबा मच रहा है। सनद रहे कि इस्लाम के आने से पूर्व अरब में लड़की को पैदा होते ही ज़िन्दा दफन कर दिया जाता था लेकिन इस्लाम के आते ही इस काम को पाप करार दिया गया और इस्लाम में लड़की के जन्म को रहमत करार दिया गया। इस्लाम में औरतों को बराबर का दर्जा दिया गया। माँ के कदमों में जन्नत होने का सबक दिया गया। पूरी इन्सानी तारीख में इस्लाम से पहले इस प्रकार का कोई सबक नहीं दिखाई पड़ता। इस्लाम ने इल्म हासिल करने के लिए कठिन से कठिन सफर तैय करने की बात कही है। लेकिन अफसोस है कि आज मज़हबे इस्लाम के मानने वाले ही इस सबक से दूर हो गये हैं। अर्थात इस्लाम मज़हब ने पूरी दुनिया को अमन, शान्ति, भाईचारा, समानता और मानवता की रक्षा का पैगाम देता है। आवष्यकता इस बात की है कि इस्लाम मज़हब को सही तरीके से समझने की और समझाने की कोषिष होनी चाहिए क्योंकि बहुत सी ऐसी बातें आम हो चुकी हैं जिसका इस्लाम से कोई तअल्लुक नहीं है और ग़लत फहमी में इस्लाम की सही तस्वीर सामने नहीं आ रही है।

उर्दू साहित्य के इतिहास में ऐसे प्रगतिषील विचारों के लेखकों की एक लम्बी कतार है जिन्होंने अपनी रचनाओं और विचारों से न सिर्फ साहित्य के गागर को सागर बनाने का काम किया है बल्कि समाज को एक नई दिषा प्रदान करने और दषा बदलने में अहम भुमिका निभाई है। ऐसे लेखकों में प्रेम चन्द, सज्जाद जहीर, उपेन्द्र नाथ अष्क, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्णचन्द्र, फैज़ अहमद फैज़, सरदार जाफरी, कैफी आजमी, फिराक़ गोरखपूरी, साहिर लुधियानवी, इस्मत चुगताई, सआदत हसन मन्टू, कुर्रअतुलऐन हैदर, मिजाज लखनवी, मजरूह सुलतानपूरी, हसन नईम आदि प्रमुख हैं। लेकिन उन सब में फैज अहमद फैज़ ने न केवल भारतीय महाद्वीप बल्कि विष्व स्तर पर एक ऐसे शायर के रूप में अपनी पहचान बनाई जो समाज में हाषिये पर खड़े लोगों की वकालत करता हो। और तमाम तरह के इज़्म और जुल्म के खेलाफ बगावत की आवाज बुलन्द करता हो। यानि जहाँ कहीं भी मानवता को कुचलने की कोषिष हो वहाँ वह शायर इन्सानियत की हिफाजत के लिए खुद को खड़ा करता हो। यही कारण है कि फैज़ अहमद फैज़ उन तमाम लोगों की आवाज बन गए जिनकी आवाज को दबाने की निरंकुष शासकों ने षडयंत्र की।

आज जब फैज अहमद फैज़ की जन्म शताबदी पूरी दुनिया में बड़े ही धूम धाम से मनाई जा रही है ऐसे समय में फैज़ की शायरी पर इस दृष्टि से भी विचार किया जाना चाहिए कि आज फैज़ अहमद फैज़ के विचारों की क्या प्रासंगिकता है। जब हम अपने जेहन में इस तरह के सवालों को रख कर फैज की शायरी का मोहासबा करते हैं तो यह हकीकत खुल कर सामने आती है कि फैज की शायरी कई मायने में अपने समकालीन शायरों से अलग है कि फैज ने अपनी शायरी को सपनों और हकीकत का संगम ही नहीं बनाया बल्कि अपनी शायरी को उन तमाम दबे कुचले और समाज के हाषिये पर खड़े लोगों की आवाज बना दी जिनकी आवाज अब तक सदा ब सेहरा साबित हो रही थी। उन्होंने एक तरफ अंग्रेजी शासन की गुलामी के खिलाफ आवाज बुलन्द की तो दूसरी तरफ समाज के उन लोगों के खिलाफ भी बगावत की आवाज बुलन्द की जो सामंति थे और दबे कुचलों पर तरह तरह के जुल्म ढा रहे थे। फैज की पूरी शायरी उनके इस पंक्ति की तरजुमान हैः-

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