धर्मनिर्पेक्षता एवं भारतीय समाजः मानवीय परिप्रेक्ष्य में

धर्मनिर्पेक्षता एवं भारतीय समाजः मानवीय परिप्रेक्ष्य में

हमारा देष भारत भौगोलिक, आनुवेंषिक, प्रजाति, परितंत्र, धर्म, भाषा, संस्कृति एवं खान-पान की दृष्टि से विविधता का एक भूखंड है। प्रकृति ने संसार में इस देष को विविधता का नमूना बनाया है। इस लिए इस पृथ्वी पर इंसान हों या हैवान उसमें भी विविधता दिखाई पड़ती है। पष्चिम से पूरब और उत्तर से दक्षिण तक निगाहें दौड़ाइये तो यह हकीकत खुद ब खुद उजागर हो जाती है कि पष्चिम में रहने वाला व्यक्ति अपने आकार और चेहरे से पूरब के व्यक्ति से भिन्न है तो उत्तर के लोग दक्षिण के लोगों से अलग अपनी पहचान रखते हैं और यही विविधता इस देष को पूरी दुनिया में अलग पहचान देती है।

इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि यहाॅ की संस्कृति ने विभिन्न धर्मों और जातियों को अपने संस्कृति में कुछ इस तरह घुला मिला कर एक ऐसा लचीला नमूना बना दिया है जिसकी मिषाल कहीं दिखाई नहीं देती। हमारी सिंधु सभ्यता संसार के लिए एक ऐसी बिन्दु साबित हुई कि इस बिन्दु से संस्कृति की सैंकड़ों लकीरें खीची गईं हैं। यह देष आदि काल से ही दुनिया को इंसान दोस्ती और शान्ति का पैगाम देता रहा है। कभी बुद्ध की ज्योति के रूप में, तो कभी महाबीर के प्रकाष की सूरत में, कभी नानक की मधुर बाणी ने मानवांे के कानों में मुहब्बत के रस घोले हैं तो कभी चिष्ती ने चरागे इंसानियत के पैगाम से अंधेरों को मिटाया है। जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने ऐतिहासिक षिकागो भाषण में कहा था-

‘‘मुझको ऐसे धर्मावलंबी होने का गौरव है, जिसने संसार को ‘साहिष्णुता’ तथा ‘सब धर्मों को मान्यता प्रदान’ करने की षिक्षा दी है, हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल साहिष्णुता में ही विष्वास नहीं करते हैं, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर ग्रहण करते हैं, मुझे आपसे यह निवेदन करते गर्व हो रहा है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूं जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में अंग्रेजी शब्द मगबसनेपवद का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं, मुझे एक ऐसे देष का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलंबियों को आश्रय दिया है’’। (षिकागो भाषण- 11 सितम्बर 1893ई0)

इस लिए तो बीसवीं सदी के एक महान चिंतक रोमा रोलाॅ ने कहा था कि –
‘‘अगर इस धरती पर कोई ऐसा स्थान है जहाॅ सभ्यता के शुरू के दिनों से ही मनुष्य के सारे सपने और आश्रय पनाह पाते रहे हैं तो वह स्थान भारत देष है’’।
और अल्लामा इकबाल ने कहा था कि-
ये हिनदियों के फिक्र-ए-फलसफा रस का है असर
रिफअत मंे आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए-हिन्द।।
है राम के वजूद पे हिन्दुस्ताँ को नाज।
अहले नजर समझते हैं इसको इमामे हिन्द।।
(नजम-राम)
फिर दूसरी जगह कहते हैं-
फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से।
हिन्द को एक मर्दे कामिल ने जगाया ख्वाब से।।
(नजम-नानक)

लेकिन आज इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विविधता और अखण्डता को महफूज रखने की है। इस समस्या के संबन्ध में जब हम गहराई से सोचते हैं तो यह हकीकत उजागर होती है कि आज हमारा देष अषांति के अंधेरों की तरफ बढ़ रहा है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि भारत की पवित्र भूमि जहाॅ हमेषा शांति के दूत जन्म लेते रहे हैं, अवतार लेते रहे हैं वहाॅ अषांति का माहौल क्योंकर है? इस धरती पर राम और कृष्ण का जन्म हुआ जिन्हांेने आपसी प्रेम और शांति की षिक्षा दी। सनातन धर्म ने पूरी दुनिया को ‘‘बसुधैव कुटुम्ब कमः’’ का उपदेष दिया, गौतम बुद्ध और महाबीर जैन ने मानवता की रक्षा को ही बड़ा धर्म जाना। इस्लाम धर्मालंबी सूफियों ने हजरत मोहम्मद (स0) के उपदेष ‘‘सारे इंसान एक ही अल्लाह की संतान हैं और सब आपस में भाई भाई है’’ का सबक सिखाया तो गुरू नानक जी ने ‘‘न तू मुसलमान न तू हिन्दू’’ कह कर सब को आपस में समान का सबक दिया, ऐसे देष में मानवता पर अगर कोई चोट हो रही है और इंसानियत शर्मसार हो रही है तो क्यों? यह एक ऐसा जलता हुआ सवाल है जिसपर न केवल घर के अंधेरे में सोचने की जरूरत ह,ै बल्कि इन अंधेरों से बाहर निकलकर आईने में अपनी-अपनी तस्वीर देखने की जरूरत है क्योंकि इंसानियत के आईने पर जो गर्द पर गई है उसने हमारे चेहरे को धुन्धला-धुन्धला सा कर दिया है। यहाॅ मैं साहित्य का छात्र होने का एक फायदा उठाते हुए यह कहना चाहता हूॅ कि-

‘‘दूसरों पर जब तबसेरा कीजिए
सामने आईना रख लिया कीजिए’’

महानुभावो! आज का विषय तीन खण्डों में तकसीम है। पहला धर्मनिर्पेक्षता- जिसकी व्याख्याॅ हमारे संविधान में की गई है। जाहिर है कि हमारा संविधान ही हमारे जीवन की रूह है। एक प्रजातंत्र देष का सबसे बड़ा तकाजा यह है कि उस देष का हर नागरिक अपने संविधान के प्रति हस्सास हो, गंभीर हो और उसके पालन के प्रति वफादार हो। दूसरा हिस्सा भारतीय समाज है जिसके संबन्ध में उपर कुछ इषारा किया जा चुका है और आगे भी बातें आऐंगी लेकिन इस विषय के अंतिम भाव व भाग मानवीय परिप्रेक्ष्य मेरे विचार में न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि उक्त दोनों भागों का रक्षक भी है।

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