समलैंगिकताः सभ्य समाज के लिए कलंक

समलैंगिकताः सभ्य समाज के लिए कलंक

एक मनुष्य और एक जानवर मंे अगर कोई स्पष्ट अन्तर है तो वह यह है कि इन्सान प्राकृतिक, सामाजिक और धार्मिक नियमों के पालन के प्रति न सिर्फ सचेत रहता है बल्कि उन नियमों के पालन को ही जीवन की कुंजी मानता है। और जब कभी इन्सान इन उसूलों से अलग आचरण करता है तो उसे आम तौर पर लोग जानवर करार देते हैं अर्थात जानवर पर कोई नियम व बंधन नहीं होता। वह अपनी चाहत व मर्जी के मुताबिक अपनी राह तैय करता है और आचरण भी अपनाता है। इस लिए जब कभी कोई इन्सान कोई ऐसा आचरण अपनाता है जो इन्सानियत के दायरे से अलग हो तो उसकी मुखालिफ़त होती है। इन दिनों पष्चिमी देषों में एक ऐसे गैर इन्सानी अमल को रिवाज दिया जा रहा है जिसे दुनिया का कोई सभ्य समाज और मज़हब कबूल नहीं करता और न एक सभ्य समाज इस प्रकार की अप्राकृतिक यौन संबन्ध की एजाज़त देता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी अप्राकृतिक आचरण मनुष्य के लिए जानलेवा साबित हुआ है।

इस लिए समलैंगिकता को किसी तौर पर भी इन्सानी अमल करार नहीं दिया जा सकता। इस्लाम में तो लूती (समलैंगिक) को जहन्नमी करार दिया गया है। बल्कि हजरत लूत (अलै0) की पूरी कौम को इसी लिए अल्लाह ने हेलाक व बर्बाद कर दिया था कि उनके अन्दर भी समलैंगिकता का चलन आम हो गया था। कुरान शरीफ के 19वें पारा सूरए शोरा आयत नं0 107 से 167 तक समलैंगिकता की बुराईयों की वजाहत की गई है और ऐसे लोगों को बार-बार हिदायत दी गई है कि गैर फितरी (अप्राकृतिक) सेक्स को मत अपनाओ, नहीं तो तुम पर अजाब नाजिल होगा। इसी तरह कुरान की सूरह बक़रह की आयत 222 और 223 में भी हिदायत दी गई है कि औरत तुम्हारे लिए पैदा की गई तुम्हारे नस्ल की अफजाईष उसी से होगी।

हदीस पाक में भी इस तरह के अमल को गुनाह-ए-अजीम करार दिया गया है। इतना ही नहीं औरतों के साथ भी अप्राकृतिक आचरण अपनाने को गुनाह करार दिया गया है। हिन्दू धर्म में ‘‘ब्रह्मचर्य गुरू’’, इसाईयों में ‘‘पादरी’’, सिखों में ‘‘भाई साहब’’ और बौद्ध में ‘‘भिच्छुओं’’ ने भी इस तरह के अप्राकृतिक यौन आचरण से दूर रहने की वकालत की है। इतिहास गवाह है कि सभ्यता के उदय काल से ही इस पृथवी पर लिंग विभेद की प्ररम्परा रही है। मनुष्य के इतिहास को देखें तो अललाह ने आदम के साथ ही हव्वा को जन्म दिया, इसाई धर्म के लोग भी इस हकीकत को मानते हैं कि एडम और ईव ही से इन्सान की नसल बढ़ी है। हिन्दुओं के यहाॅ भी देवताओं के साथ-साथ देवियों के वजूद का जिक्र मौजूद है।

इतना ही नहीं जानवरांे में भी नर और मादा के मिलन से ही नई नस्ल की उत्पत्ति होती है। अर्थात प्राकृतिक तौर पर ही जिन्स (सेक्स) के लिए समान रूप को अप्राकृतिक माना गया है। इस लिए यदि आज का मनुष्य प्राकृतिक, धार्मिक और समजिक नियमों के परे कोई ऐसा आचरण करता है जो इन्सान को इन्सान के दायरे से अलग करता हो तो उसे किसी तरह भी सभ्य समाज कबूल नहीं कर सकता। वैज्ञानिक दृष्टि से भी समलैंगिकता मानवता के लिए हानिकारक है। क्योंकि एडस जैसी जानलेवा बीमारी के अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण समलैंगिकता ही है। अफ्रिकी देषों में समलैंगिकता के कारण ही एडस की बीमारी का जाल फैला था जो पूरी दुनिया के लिए तबाही साबित हुआ है। हमारे वैज्ञानिकों ने अपने शोध से साबित किया है कि ऐसे पुरूष जो अपने सेक्स की इच्छा की पूर्ति के लिए अप्राकृतिक यौन माध्यम का प्रयोग करते हैं वह एडस एवं कैन्सर की बीमारियों को खुद से दावत देते हैं।

इस लिए विष्व स्वास्थ्य संगठन के जरिये पूरी दुनिया में इस पैगाम को पहूंचाया जा रहा है कि मनुष्य को अप्राकृतिक यौन संबन्धेंा से परहेज करना चाहिए, नही तो आने वाले दिनों में एडस जैसी मानव विनाषकारी बीमारी को रोकना असम्भव होगा। आज जिन देषों में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दी जा रही है वहाॅ भी पूरा समाज उसे कबूल करने का तैयार नहीं है और वहाॅ भी इसका विरोध हो रहा है। दरअसल जिन देषों में सांस्कृतिक, समाजिक और धार्मिक ताना-बाना बिलकुल बिखर गया है उन्हीं देषों में स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह के गैर इन्सानी अमल को बढ़ावा मिल रहा है। जहाॅ तक इस्लामिक देषों का प्रष्न है तो वहाॅ किसी तरह भी समलैंगिकता को कबूल नहीं किया जा सकता क्योंकि इसलाम मजहब में इस तरह के अमल की इजाजत नहीं है जैसा कि मैंने उपर कुरान और हदीस के हवाले से बातें कही हैं। भारत जैसे सनातन धर्मी बहुसंख्यक देष मे भी समलैंगिकता स्वीकार नहीं हो सकता क्येांकि भारतीय सभ्यता व संस्कृति के ताने-बाने अब भी मजबूत हैं।

आज पूरी दूनियाॅ में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह मानव मूल्यों को खत्म करने की चेष्टा हो रही है उससे तो एैसा लगता है कि वह दिन दूर नही जब आदमी अपनी आदमीयता खो बैठेगा और ईष्वर ने इस पृथ्वी पर लिंग संतुलन के लिये जो व्यवस्था की है उसकी समाप्ति का सामान इंसानों के द्वारा किया जायेगा और जब एैसा होगा तो उसका परिणाम क्या होगा उससे हम खुब बाकिफ है कि प्राकृतिक नियमों के उलंघन से मानव जाति का किस प्रकार विनाष होता है। समलैंगिता या पुरूषों की कोख में बच्चा पालने जैसी तकनिक का इजाद मानव विनाष की पहल ही तो है। कहा जाता है कि विज्ञान मानव को नयी चीजों से अवगत कराती हैै और मानव जीवन को आसानी फराहम करती है लेकिन आज विज्ञान के तकनीक का उपयोग मानव विनाष के लिये किया जा रहा है। क्या हमने कभी यह सोचा है कि पषुओं की नर जाति की कोख में बच्चा पालने की विधि का आविष्कार कर सके हैं ? अगर नही तो मानव के संबध में ये सोच क्यो ?

इसी प्रकार अब तक जानवरो में भी समलैंगिता का आचरण नही आया है लेकिन 21वीं सदी का मानव इस अप्रकृतिक आचरण को अपना कर लिंग संतुलन को बिगाड़ने की कोषिष कर रहा है जो उसके विनाष का कारण हो सकता है। दरअसल आज के भूमंडलिकरण के दौर में आदमी सोहरत पंसदी का षिकार हो गया है और मिडिया की सहुलत ने इंसान को एैसे-एैसे करतुत करने पर मजबूर कर दिया है जिससे उसे पूरी दुनियाॅ में शोहरत मिल जाती है। नतीजा है कि आए दिन एैसी-एैसी हकीकतें सामनें आ रही है जिसका संबंध मानव सभ्यता से नही बल्कि हैवानियत का प्रतीक है। समलैंगिता भी एैसे ही लोगों के जेहन की उपज है जो प्रकृति की कृति और जाति संतुलन से अनजान है और एक सभ्य समाज को कलंकित करने की कुचेष्टा करने पर आतुर है। यदि मानव अपनी सृष्टि के संबंध में सोचे तो उसे इस हकीक़त का ऐहसास खुद ही हो जायेगा कि प्रकृति ने इस दुनियाॅ में मर्द औरत को क्यांेकर पैदा किया। समलैंगिता एक बीमार जेहन की उपज है और उसे सभ्य समाज कभी भी कबूल नही कर सकता क्यांेकि आज भी इस पृथ्वी पर 99 प्रतिषत एैसे लोग है जो इस हकीकत हो खुब समझते हैं। प्रकृति के नियमों के विरूद्ध इंसान का कदम इंसान के लिये कितना हानिकारक साबित हुआ है। इसलिये देर या सवेर उन देषों में भी इस अप्राकृतिक आचरण अर्थात समलैंगिकता के खिलाफ आवाज बुलंद होगी क्योंकि इंसान अपनी इंसानियत पर खुद ही सवालिया निषान नही लगा सकता ?

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