सर सय्यद अहमद खाॅ के विचारों की प्रासंगिकता?

सर सय्यद अहमद खाॅ के विचारों की प्रासंगिकता?

भारतीय इतिहास के पन्नों को उलट कर देखते हैं तो यह हकीकत सामने आती है कि इस महाद्वीप में ऐसे ऐसे सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक, दार्षनिक एवं सुधारक पैदा हुए हैं जिनके विचारों से न केवल देष की भौगोलिक तस्वीर बदली है बल्कि आम जनों की तकदीर भी बदली है। वैसे ही दाषर्निक एवं समाज सुधारक की सूचि में सर सय्यद अहमद खाॅ को प्रमुख स्थान हासिल है। उनके विचारों ने एक अहद (युग) को प्रभावित किया है। सर सय्यद की जिन्दगी एवं उनके कार्यों का सरसरी मुतालआ यह साबित करता है कि उन्होंने हिन्दुस्तानी कौम की तालीमी, समाजी और सियासी जिन्दगी में इन्कलाब पैदा किया। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ महदूद जेहन (संकृर्ण) मानसिकता के लोग सर सय्यद को एक खास वर्ग यानी मुसलमानों से जोड़ कर देखते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सर सय्यद ने जो कुछ भी किया वह एक हिन्दुस्तानी के जीवन स्तर को उठाने और अषिक्षा जैसी लानत को खत्म करने के लिए किया। हाॅ! यह सच है कि उन्होंने अपने कार्यों को उन क्षेत्रों में अधिक किया जहाॅ मुसलमान बहुसंख्यक थे। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सर सय्यद ने ए0एम0ओ स्कूल जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विष्वविद्यालय के रूप में परिणत हुआ उससे पहले बिजनौर और गाजीपुर में भी षिक्षा की अलख जगा चुके थे और उनके द्वारा स्थपित स्कूलों में मात्र मुस्लिम समुदाय के ही छात्र शामिल नहीं थे।

इतिहास साक्षी है कि अलीगढ़ विष्वविद्यालय की स्थापना में केवल मुसलमानों का ही योगदान नहीं रहा है बल्कि भारतीय समाज के हर वर्ग के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जिसके परिणाम स्वरूप अलीगढ़ में स्थापित स्कूल ने देखते ही देखते विष्वविद्यालय का रूप धारण किया। थोड़ी देर के लिए यदि आप यह भी मान लें कि सर सय्यद ने मुसलमानों की षिक्षा और समाजिक स्तर को उठाने का काम किया तो क्या यह एक भारतीय के जीवन को बदलने का प्रयास नहीं था ? राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया और उनका यह कदम मात्र हिन्दू समाज तक सिमित था तो क्या हम उन्हें सिर्फ हिन्दू समाज का सुधारक कहेंगे ? नहीं कभी नहीं क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया एक भारतीय समाज को नई दिषा देने के लिए किया इस लिए हर एक भारतीय के उपर यह फर्ज है कि हम राजाराम मोहन राय के सुधार कार्यों की सराहना करें। यदि मोहन राय ने उस समय समाज सुधार एवं षिक्षा के लिए आन्दोलन न चलाया होता तो आज भारत में नारियों की हालत क्या होती उसे सोच कर ही जेहन काॅप जाता है। मेरे कहने का अर्थ यह है कि सर सय्यद या राजाराम मोहन राय या अन्य समाजसुधारकों को किसी खास वर्ग से जोड़ कर देखना न सिर्फ उनके विचारों की महत्ता हो कम करना होगा बल्कि भारत की अखण्डता के अहम सतूनों को कमजोर करने का प्रयास होगा।

आज जब हम भूमंडलीकरण के दौर में जी रहे हैं और इस 21वीं सदी में पूरी दुनिया बाजार बन चुकी है, हर नई सुबह के साथ कल की चीज बेमानी हो रही है ऐसे समय में प्रष्न उठता है कि 19वीं और 20वीं सदी के समाज सुधारकों, विचारकों और दार्षनिकों के विचारों की आज प्रासंगीकता क्या है ? कुछ लोगों का कहना है कि इन दार्षनिकों के विचार अब हमारी रहनुमाई नहीं कर सकते। लेकिन मेरे विचार में सर सय्यद जैसे समाज सुधारक और दार्षनिक दानिष्वर के विचारों की प्रासंगीकता आज भी है। क्योंकि उनहोंने आज से 150 वर्ष पूर्व जो विचार विषेषकर षिक्षा के मामले में दिये थे वह आज भी उतने ही अहम हैं जितने अहम उस समय थे। 1883 ई0 में सर सय्यद ने कहा था कि ‘‘कोई भी समाज उस समय तक सभ्य एवं षिक्षित नहीं हो सकता जब तक नारी षिक्षा के लिए उसी तरह प्रयास नहीं किया जाए जिस प्रकार लड़कों की तालीम के लिए किया जाता है। यदि औरतें लायक नहीं बनती हैं तो मर्दों के अधिकतर प्रयास सफल नहीं हो सकते’’। आज पूरे देष में इस बात की वकालत की जा रही है कि जब तक नारी पूर्ण रूप से षिक्षित नहीं होगी उस वक्त तक हमारा समाज या देष विकसित नहीं हो सकता। सर सय्यद यह विचार पहले ही दे चुके थे।
आज हर तरफ तकनिकी एवं व्यवसायिक षिक्षा पर जोर देने की बात हो रही है और हर अभिभावक अपने बच्चों को इसी क्षेत्र की षिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं। सर सय्यद ने भी उसी समय इस बात की वकालत की थी कि छात्रों को समय अनुकूल षिक्षा देनी चाहिए। जिस समय जैसी षिक्षा की आवष्यकता हो उसी क्षेत्र में छात्रों को रूची लेनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ‘‘जो षिक्षा समय के मुताबिक न हो वह गैर मुफीद है यदि लोग इस बात का ख्याल नहीं रखेंगे तो षिक्षित हो कर भी मुफलिस (गरीब) और मुहताज रहेंगे’’।

आज कृषि के क्षेत्र में उन्नत बीज और आधुनिक तकनीक से खोती करने पर गहन विचार हो रहा है और हमारे कृषि वैज्ञानिक यह बात बार-बार कह रहे हैं कि यदि आधुनिक तरीके से कृषि कार्य किया जाय तो उपज बढ़ाई जा सकती है। जरा सर सय्यद के इस तरह के विचारों पर ध्यान दीजिए जो उन्होंने आज से करीब 150 वर्ष पूर्व में कही थी। ‘‘यह बात सच है कि हिन्दुस्तान की जमीन कस्रते पैदावार (अधिक उपजाउ) है लेकिन अगर इस उम्दा जमीन में काष्तकारी जदीद कायदे (आधुनिक तरीके) से हो तो और ज्यादा तरक्की मुम्किन है’’। ज्ञातव्य हो कि उन्हों ने 1863ई0 में जो साईंटिफिक सोसाइटी, गाजीपुर की स्थापना की थी उसमें कृषि क्षेत्र पर विषेष ध्यान देने की वकालन की थी और उन्होंने अपने एक मित्र स्मिथ इल्डर को लंदन एक पत्र लिखा था कि कृषि पर आधारित कोई नई पुस्तक लिखी गई हो तो भेजें। उपरोक्त विचारों को देखकर आप स्वयं भी अन्दाजा लगा सकते हैं कि सर सय्यद की निगाह किन-किन क्षेत्रों पर थी और वह कितने बड़े दानिष्वर थे। आज भी उनके विचारों को हम यह कह कर नजर अंदाज नहीं कर सकते कि आज के समय की पुकार पर उनके विचार पूरे नहीं उतरते।

यहाॅ मैं सर सय्यद के जीवन के उस एक पहलू पर भी थोड़ी सी रौषनी डालना चाहता हूँ। उनके संबन्ध में एक गलतफहमी यह है कि वे अंग्रेजों के करीब थे और उनके सहयोगी थे। यह बिलकुल गलत है। सर सय्यद अंगे्रजी शासन में एक सरकारी मुलाजिम थे और उस समय कोई भी सरकारी उहदे पर रहने वाला व्यक्ति अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बोल सकता था लेकिन 1857ई0 के बाद देष में अंग्रेजों ने भारतीयों के बीच जो नफरत की दीवार खड़ी करनी शुरू की तो सर सय्यद ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि पूरे देष में घूम-घूम कर भारतीयों को समझाने का ठोस प्रयास किया कि अंग्रेज हम भारतीयों को जाति और धर्म के नाम पर बाॅट रहे हैं और हमारी एकता को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘‘हिन्दुस्ता के हिन्दू और मुसलमान दोनों एक ही हवा में साॅस लेते हैं, एक ही गंगा जमुना का पानी पीते हैं और एक ही धरती की पैदावार खाते हैं, खुदा की बनाई हुई दुनिया के एक हिस्से यानी हिन्दुस्तान में जीते और मरते हैं फिर हम दोनेां के बीच यह दूरियाॅ क्योंकर हैं, हमारे दरमयान नफरत क्यों है’’।

सर सय्यद के उपरोक्त विचारों को देख कर आप स्वयं भी फैसला कर सकते हैं कि सर सय्यद कितने बड़े राष्ट्र भक्त थे और एकता के लिए उनके प्रयास उस कठिन समय में भी कितने सराहनीय थे। यह सर सय्यद के प्रयासों का ही नतीजा था कि देष के विभिन्न भागों में एक बड़ी जमाअत तैयार हुई जो अंग्रेजों के ‘‘फूट डालो और राज करो’’ के नापाक इरादों और साजिषों के खिलाफ आवाज बुलन्द की। लेकिन अफसोस है कि सर सय्यद को आज भुला दिया गया है और राष्ट्र के लिए किये गए उनके कारनामों को सराहने की बात तो दूर रही कुछ लोग उनके विचारों और कार्यों पर प्रष्न चिन्ह भी लगाते हैं। लेकिन ऐसा मात्र वह लोग करते हैं जिनकी सोच किसी न किसी इज्म की षिकार है और उनके सोचने का दायरा संकृर्ण है। वरना आज पूरी दुनिया इस बात को मानती है कि यदि सर सय्यद ने 1857 ई0 के बाद भारत में षिक्षा की ज्योति नही जलाई होती तो आज भारत विष्व के मुकाबले षिक्षा के क्षेत्र में सौ साल और पीछे होता और विषेषकर मुस्लिम समाज की दुनिया तो बिलकुल ही अन्धेरी होती। आज जब सच्चर कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में इस सच्चाई को उजागर कर दिया है कि देष में मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक एवं शौक्षणिक स्थिति दलित से भी बदतर है तो ऐसी स्थिति में सर सय्यद खाॅ के विचारों एवं कार्यों की प्रासंगीकता एवं महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।

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