हमारे संविधान में धर्मनिर्पेक्षता की शक्ति

हमारे संविधान में धर्मनिर्पेक्षता को पूरी वजाहत से पेष किया गया है और यह बताया गया है कि ‘‘धर्मनिर्पेक्ष राज्य वह राज्य है जो धर्म की व्यक्तिगत तथा समवेत स्वतंत्रता प्रदान करता है अर्थात संवैधानिक रूप से किसी विषेष धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है और जो धर्म का न तो प्रचार है और न ही उसमें हस्तक्षेप करता है’’। मुमकीन है कि संविधान की इस व्याख्या को आप अपने तौर पर कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि हर नागरिक अपने धर्म के मामले में आजाद है। जैसा कि न्यायमूर्ति गजेंद्र गडकर ने कहा था कि- ‘‘सभी नागरिकों को नागरिकों के रूप में समान अधिकार प्राप्त है तथा इस मामले में उनका पंथ या मजहब पूर्णतया अप्रासंगिक है। जैसा कि हम जानते हैं कि 42 वें संविधान संषोधन से पहले ‘‘सैकूलर’’ शब्द का एक मात्र जिक्र संविधान अनुछेद 25(2) में आया था जिसमें राज्यों को धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी भी लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निवर्धन करने की शक्ति प्रदान की गई थी। स्पष्ट है कि यहाॅ पर सैकूलर शब्द का प्रयोग ‘‘लौकिक’’ के अर्थ में अथवा शुद्ध धार्मिक मामलों से भिन्न अर्थों में लिया गया है। जाहिर है कि संविधान संसोधन कर इस शब्द को जोड़ा जाना न सिर्फ अपनी शाब्दिक अहमियत रखता है बल्कि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की प्रासंगिकता को बरकरार रखने में सहायक भी है। जैसा कि 1974ई0 में हमारे माननीय उच्चतम न्यायालय ने सेंटजेवियर काॅलेज सोसाईटी बनाम गुजरात राज्य के मामले में निर्णय दिया था कि ‘‘भले ही संविधान में धर्मनिर्पेक्ष राज्य की बात नहीं कही गई है फिर भी इस विषय में कोई संदेह नहीं है कि संविधान निर्माता इसी तरह का राज्य स्थापित करना चाहते थे’’

(हमारा संविधान-भारत का संविधान और संवैधानिक विधि, सुभाष काष्यप- पृष्ठ,51, संस्करण 1996)।

संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,19,25 और 28 में भी अन्य बातों के साथ- साथ विष्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता शामिल है। संक्षेप में बस इतना समझना हम सब के लिए लाजमी है कि भारत एक प्रजातंत्र देष है और प्रजातंत्र का संविधान ही अपने नागरिक के जीवन जीने के तरीके व अधिकारों का चिराग-ए-राह है और उसी की रोषनी में हर नागरिक आजादी के साथ अपनी राहें तलाष सकता है और अपनी मंजिलों को पहुंच सकता है और जब कभी हम अपने इस चिराग की रोषनी से मुँह फेर कर चलने की कोषिष करेंगे तो हमारे सामने अंधेरा होगा और वह अंधेरा हमारे समाज की तस्वीर को न सिर्फ धुंधला बनाएगा बल्कि मानवीय मूल्यों से भटकाव भी पैदा करेगा और आज जाने- अंजाने हम लोग अपने संविधान से रौषनी हासिल करने से गुरेज कर रहे हैं। नतीजा है कि हमारे इस गुलषन पर कफस का धोका होने लगा है। यहाॅ भी मैं अपना एक शेर पेष करने की इजाजत चाहता हूॅ-

अब तो गुलषन पे भी होता है कफस का धोका।
चार सू बैठा है सैयाद कहाॅ तक जाउॅ।।

मगर उदास या निराष होने की आवष्यकता नहीं है क्योंकि हमारा इतिहास गवाह है कि जब कभी इस भूखण्ड पर अंधेरा फैला है तो रोषनी भी मिली है और वह रोषनी धर्म के रूप मंे, नई तहजीब व तमद्दुन की शक्ल में या फिर नये विचारों के सूरज के घनेरे बादल से निकलने और रौषनी फैलने से नई चेतना पैदा हुई है और जिंदगी जीने की नई राहें निकली हैं।

महानुभावो! मैं इस्लाम धर्म का मानने वाला हूॅ, आप सब जानते हैं कि इस्लाम का जन्म ही इंसानियत की रक्षा के लिए हुआ क्योंकि कुरान की पहली आयत की शुरूआत ही यह कहती है- ‘‘अलहमदुलिल्लाहे रब्बिल आलमीन’’ अर्थात् तारीफ उसकी जो सारे जहान का रब है। जाहिर है इस्लाम ने यह नहीं कहा कि अल्लाह सिर्फ मुसलमानों का रब है। जब पूरी दुनिया का रब है तो दुनिया में जितने भी मनुष्य हैं सब अल्लाह के बंदे हैं फिर इस्लाम के संबन्ध में इतनी गलतफहमियाॅ क्यों हैं? इसमें सिर्फ उनका कसूर नहीं है जिन्होंने इस्लाम को नहीं समझा है, बल्कि कसूर तो उनका है जिन्होंने इस्लाम को समझा है लेकिन अपने आचरण से औरों को इस्लाम से अवगत नहीं कराया है और यह बात सिर्फ इस्लाम धर्म पर ही लाजिम नहीं होता, बल्कि अन्य धर्मों के लोगों ने भी अपने-अपने धर्मों की तकाजों से अलग हटकर चलने की कोषिष की है। इस्लाम धर्म के पैगम्बर मोहम्मद (स0) ने जब यह कहा था कि ‘‘उस वक्त तक तुमपर खाना हराम है जब तक तुम्हारा पड़ोसी भूखा है’’। सनद रहे कि मोहम्मद (स0) ने शब्द ‘‘पड़ोसी’’ कहा है मुसलमान नहीं। लेकिन आज का मुसलमान क्या इस हदीस पर पूरा उतर रहा है यदि पूरा उतर रहा होता तो शायद वह अपने पड़ोसी की नजर में गैर न समझा जाता और न अन्य धर्माें के मानने वालों के जेहन में अपने प्रति कई तरह के सवालों का प्रतीक बनता। आवष्यकता इस बात की है कि मजहब ने जो सबक सिखाएँ हैं उस सबक को जीवन जीने का उसूल समझा। जाए और यदि हर धर्म का व्यक्ति अपने-अपने धर्म के तकाजों को पूरा करने लगे तो फिर मानवता के लिए खतरा क्योंकर हो सकता है? और भारत का सनातन धर्म जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानता हो उसमें जाति, धर्म या पंथ मंे विभेद का प्रष्न कहाॅ है?

श्रीमद् भागवत गीता के अध्याय 4 में जब यह कहा जा रहा है किः-
‘‘ये यथा माॅ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्
मम वत्र्मानु वर्तन्ते मनुष्याः प्रार्थ सर्वषः

अर्थात अर्जुन से कहा जा रहा है कि जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूॅ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। सनद रहे कि यह शब्द मनुष्य का प्रयोग हुआ है हिन्दू का नहीं। यानी ईष्वर की निगाह में इंसानियत के बीच कोई दीवार नहीं है और जब ईसा मसीह ने कहा थाः-

Of all the religions, the best religion is too do pious deeds. तो इसका मतलब ही था मजहब के सहारे मानवता का पाठ पढ़ाना। और इस लिए भारत की धार्मिक विविधता को स्वीकार करते हुए मिर्जा गालिब ने भी कहा था-

वफादारी बषरते उस्तवारी असल ईमाॅ है।
मरे बुतखाने में, तो काबे में गारो ब्रहमण को।।

लेकिन सच्चाई यह है कि हम हिन्दू हों कि मुसलमान, सिख हों कि ईसाई कहीं न कहीं अपने धर्मों के असल सबक को समझने में कासिर रहे हैं नतीजा है कि एक दूसरे को समझने में भी नाकाम रहे हैंः-

कोई दीवार तो थी हायल के हम तुम बरसों।
एक ही घर में रहे, फिर भी शनासा न हुए।।

और शनासा न होने के कारण ही तो आज भारतीय समाज अनेक तरह की बेचैनियों का ठिकाना बन गया है। दिनों दिन मानवीय मूल्यों की अहमियत दरकिनार होती जा रही है। जिसका परिणाम है कि आज हम ‘‘धर्मनिर्पेक्षता एवं भारतीय समाजः मानवीय परिप्रेक्ष्य’’ जैसे ज्वलंत विषय पर चर्चा करने के लिए जमा हुए हैं।
आईये! इस अवसर पर हम सब राष्ट्रपिता महात्मा गाॅधी के इन उपदेषों को अपने जेहन-व-दिल में जगह दें कि बापू की इन बातों में पूरी मानवता की रक्षा का संदेष है-
‘‘मैं ऐसे भारत के लिए कोषिष करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी यह महसूस करें कि यह उसका देष है, जिसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोषिष करूंगा, जिसमें उँच-नीच का कोई भेद न हो। जातियाॅ मिलजुल कर रहती हों। ऐसे भारत में अस्पृष्यता व शराब तथा नषीली चीजों के अनिष्टों के लिए कोई स्थान न होगा। उसमें स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार मिलेंगे। सारी दुनिया से हमारा संबंध शांति और भाईचारे का होगा। यह है मेरे सपनों का भारत’’।
अब ईसा मसीह के इस उपदेष को अपनी जिन्दगी में उतारने का अहद करें क्योंकि यह उपदेष भी पूरी मानवता की रक्षा का संदेष देता है।

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